एक मुलाकात: सरिता कुमारी

आज मिलिए प्रसिद्ध लेखिका व कवयित्री सरिता कुमारी से.

अनुभूति, एक टुकड़ा धूप का उनकी प्रमुख कविता संग्रह हैं तथा ओ रे रंगरेज…, नन्हा फरिश्ता, बंद लिफाफा, वह अजनबी, पोटली और सुरीली उनकी बहुचर्चित कहानियां हैं. उनका कहानी संग्रह ‘उजालों के रंग’ वर्ष २०१८ में अनुज्ञा बुक्स, दिल्ली से प्रकाशित हुआ है. किताब के लिए यहाँ क्लिक करें.

सरिता अपनी कहानियों और किरदारों को बखूबी ज़िन्दगी की फिलोसोफी के धागे से बांधती हैं. आप इनकी कहानियां पढ़ने के बाद कहीं न कहीं खुद को किरदारों की भावनाओं , उम्मीदों और सपनों से खुद को जुड़ा हुआ महसूस करेंगें। सरिता को २०१९ में ‘महेन्द्र रत्न साहित्य सम्मान’ से पुरस्कृत किया गया है.

अपनी कहानी लिखने के पीछे की कहानी हमें बताएँ। पहली बार कब लिखना शुरू किया?

कहानी लिखने के पीछे की तो कोई खास कहानी नहीं है। पढ़ना बहुत अच्छा लगता रहा है, हमेशा से। पढ़ने की इसी आदत ने विचारशील बना दिया। विचारों ने जब अभिव्यक्ति का मार्ग तलाशा तो लिखना अनिवार्य सा लगने लगा। थोड़ा – बहुत लिखना तो बचपन से ही चल रहा था। गम्भीरता से लिखना वर्ष 2015 से शुरू किया। कहानियाँ जब प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्र – पत्रिकाओं में छपने लगीं तो लिखते जाने को हौसला मिला। अब तक लगभग 25 – 30 कहानियाँ विभिन्न प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्र – पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं / प्रकाशनाधीन हैं।

लेखन में अपना गुरु किसे मानती हैं और क्यों ?

सच कहूँ तो किसी को भी नहीं। मेरा जैसा स्वभाव और व्यक्तित्व रहा है। मैं बहुत गहराई से किसी से भी प्रभावित नहीं होती। किसी की कोई बात अच्छी लगती है तो किसी की कोई और। सीखने के लिए हर व्यक्तित्व, हर घटना, हर परिवेश में कुछ न कुछ तो होता ही है। इस हिसाब से ये सब ही किसी न किसी मायने में गुरू माने जा सकते हैं।

क्या लिखना ज़्यादा पसंद करती हैं, कविताएँ या फिक्शन?

लिखने की शुरुआत कविताओं से हुई थी। कहानियाँ लिखना शुरू किया तो कविताओं से अधिक कहानियाँ लिखना अच्छा लगने लगा। अब तो लगातार कहानियाँ ही लिख रही हूँ।

आपका जॉब, आपके लेखन को प्रभावित करता है? कैसे?

जॉब लेखन को प्रभावित तो करता ही है, कभी सकारात्मक रूप में तो कभी नकारात्मक रूप में। कभी कोई कहानी जब पूरी तीव्रता से विचारों के दामन से झूलती कहानी का रूप धरने को बेताब होती है और वर्क प्रेशर इसकी अनुमति नहीं देता, लगातार कई – कई दिन तक, ऐसे में कई कहानियाँ जन्म से पहले ही मर जाती हैं। कई बार तीव्रता इतनी घट चुकी होती है कि कहानी लाख कोशिश के बाद भी उस रूप में नहीं उतर पाती, जिस रूप में दिमाग में कौंध रही होती है।

कई बार इसके उलट समय न मिलने पर कहानी धीरे – धीरे चूल्हे की सेंक सी पकती रहती है, और जब समय मिलने पर कहानी का रूप लेती है तो दिमाग में पहले ही कई – कई ड्राफ्ट से गुजर चुकी होती है। इस तरह से देखें तो जॉब लेखन को सकारात्मक और नकारात्मक दोनों रूप में प्रभावित करता है।

आपकी कहानियों में आइडियाज कैसे ट्रिगर होते हैं:- कोई घटना, कोई डायलाग जो आपने कहीं सुना हो या कोई करैक्टर जिनसे आप कभी मिली हो?

कहानियों में आइडियाज उपरोक्त सभी बातों का मिश्रण होते हैं। कई बार नितान्त काल्पनिक होते हैं, जिनका आस – पास के वातावरण या परिवेश से प्रत्यक्ष रूप से कोई सरोकार नहीं होता है।

आपने अपनी कहानियों के माध्यम से कंटेम्पररी सोशल इश्यूज को काफी इम्पोर्टेंस दी है जैसे स्किन कलर, सेक्सुअल आइडेंटिटी। आपने यह इश्यूज को कैसे सेलेक्ट किया?

मुझे कई बार महसूस होता है, हमारे समाज में, परिवेश में, हम सबमें, किसी न किसी रूप में हिप्पोक्रेसी है। हम सोचते कुछ हैं, कहते कुछ हैं, चाहते कुछ हैं, करते कुछ हैं । बहुत सारे मौकों पर हम बड़ी – बड़ी बातें करते हैं। मानवता की, दया – धर्म, उदारता की। मौके – बेमौके, बड़ी – बड़ी बातें करने वाले वही हम, लोगों की मजबूरी, उनकी आँखों में तैरता दर्द न देख पाते हैं, न महसूस कर पाते हैं। अपनी ही धुन में, अपनी सीमित सोच और समझ के दायरों में गुम हम, लोगों की तकलीफ समझने और उनकी मदद करने के बजाय, उन्हें परेशान करने से बाज नहीं आते। ‘ओ रे रंगरेज’ और ‘इंद्रधनुष’ जैसी कहानियाँ, हम सबकी इसी सोच का प्रतिरूप हैं ।

आपकी कहानी ‘पोटली’ बहुत इमोशनल कहानी है. आपके कहानी के किरदार इतने पॉजिटिव कैसे रहते हैं? 

‘पोटली’ कहानी भी उन कहानियों में है जो एक झटके में लिखा गईं। कुछ लिखना है कि तलब, कुछ धुँधले से विचार, बस लिखना शुरू किया और डेढ़ – दो घण्टे में ‘पोटली’ कहानी तैयार थी। लिखने के दूसरे दिन ही वागर्थ पत्रिका में भेज दिया और 15 – 20 दिन में कहानी प्रकाशन के लिए चयनित हो गई। लिखते समय कोई विशेष भाव मन में नहीं था। कहानी छपने के बाद पाठकों की प्रतिक्रियाओं ने थोड़ा हैरान कर दिया। इस छोटी सी कहानी में पाठकों को बहुत सी ऐसी बातें दिखीं और महसूस हुईं, जिन पर मैंने सोचा तक नहीं था। लगभग हर पाठक की यही प्रतिक्रिया थी कि कहानी ने उनकी आँखें नम कर दी। मुझे लगता है यह कहानी की अपनी शख्सियत है कि वह पाठकों के सीधे दिल पर दस्तक दे पा रही है।

आपकी दूसरी बात कि कहानी के किरदार इतने पॉज़िटिव कैसे रहते हैं? ऐसा शायद इसलिए हो सकता है कि मैं खुद सकारात्मक बने रहने का पूरा प्रयास करती हूँ। हालाँकि वास्तविक जीवन में थोड़ा कठिन होता है ऐसा करना। कहानी के किरदार को पॉजिटिव बनाए रखने की कोशिश शायद इसी सोच का प्रतिफल है।

क्या कोई थीम या एरिया है जिसके  बारे में आप लिखना चाहती है, पर अभी तक नहीं लिखा?

हैं कुछ विषय पर कोई थीम या एरिया जब तक खुद कहानी का बाना पहनने को तैयार न हो, उस पर कहानी लिखना लगभग असम्भव होता है। इसीलिए कुछ विषय बहुत इच्छा होने पर भी कहानी का रूप नहीं ले पाए अब तक। बस प्रतीक्षा है उनके कहानी बनने की।

आप दिन के किस समय लिखना पसंद करती है और आपका पसंदीदा राइटिंग स्पॉट कौन सा है?

लिखने का न कोई पसंदीदा समय है और न ही कोई पसंदीदा राइटिंग स्पॉट।  जब कोई कहानी पूरी शिद्दत से मन की देगची में तेजी से खदबदा रही होती है और उसे लिखने का पूरा मन बना हुआ होता है, घर – बाहर, ऑफिस का कोई जबरदस्त दबाव नहीं होता है तो बस कहानी मोबाइल की कीज् पर दबाव डालती कहानी के रूप में तेजी से ढल जाती है। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि समय क्या है और स्थान क्या है। रात के दो बजे भी कहानी लिखी है और टेनिस कोर्ट और बच्चों के साथ देखते किसी फिल्म के क्लाइमेक्स के दौरान भी लिखी है। साथ के लोगों की डाँट भी खाई है कि तुम मोबाइल में घुसी क्या कर रही हो ऐसे में, हद है। पर बस कहानी तो मुझे लगता है ऐसे ही लिखाती है। हाँ, एक अदद हिन्दी टाइप करने वाले बढ़िया फोन की दरकार होती है बस।

आपकी पसंदीदा शोर्ट कहानी, नावेल  या कविता कौन सी है और क्यों ?

पसंदीदा कहानी, नॉवेल या कविता बताना थोड़ा कठिन है। पिछले एक – दो महीने में कुछ बहुत अच्छी रचनायें पढ़ी हैं, उन्हें निस्संदेह पसंदीदा रचनाओं में शामिल कर सकती हूँ। ये रचनायें हैं फ्योदोर दॉस्तोव्येस्की की ‘क्राइम एंड पनिसमेंट’, ‘दि करमाज़ोव ब्रदर्स’, श्री विनोद श्रीवास्तव की ‘वजह बेगानगी नहीं मालूम’, जॉर्ज ओरवेल की ‘1984’ और काफ्का की ‘मेटामॉरफॉसिस’।

अब एक बहुत ही क्लीशेड सवाल – आप जॉब, फॅमिली और राइटिंग सब एक साथ कैसे मैनेज करती हैं ? 

सच बताऊँ तो पता नहीं। हाँ, एक अच्छी आदत है कि मुझे मेरी प्राथमिकताएँ बहुत स्पष्ट दिखती हैं। बहुत फोकस्ड रहती हूँ इसीलिए समय निकालना या सामांजस्य बिठाना इतना कठिन नहीं लगता। अगर ऑफिस में कुछ महत्वपूर्ण चल रहा है और वहाँ पूरा ध्यान देना जरूरी है या बच्चों का कुछ बहुत जरूरी चल रहा है, तो पूरा ध्यान वहीं लगाने की कोशिश करती हूँ, बाकी हर जगह से स्विच ऑफ हो जाती हूँ। एक और बात है, टी वी देखने की आदत नहीं है। टी वी सीरीयल्स बिल्कुल ही नहीं देखती। कभी – कभार न्यूज चैनल्स या बच्चों की पसंद की फिल्में, एनिमल प्लैनेट या डिस्कवरी जैसे चैनल्स देख लेती हूँ। जब बेटियाँ छोटी थीं तो उनके साथ उनकी पसंद के कार्टून चैनल्स देख लेती थी। इस आदत के कारण लिखने – पढ़ने का पर्याप्त समय मिल जाता है।

अब नया क्या लिख रही हैं?

एक – दो कहानी मन में कुछ समय से उमड़ – घुमड़ रही हैं पर लिखने में मन नहीं जम रहा है, इसलिए लिखना नहीं हो पा रहा है। शायद अभी कच्ची हैं, पक गईं तो शायद एक झटके में लिखा जाएँ। वैसे भी आजकल पढ़ने में मन लगा हुआ है इसलिए लिखना इंतजार वाले ड्राअर में बंद है।

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